रामपुर। टीईटी (शिक्षक पात्रता परीक्षा) की अनिवार्यता को लेकर शिक्षकों में व्याप्त असमंजस और चिंता के बीच टीचर फेडरेशन ऑफ इंडिया के प्रयास रंग लाते दिख रहे हैं। संगठन द्वारा देशभर में चरणबद्ध आंदोलन एवं सांसदों को ज्ञापन सौंपने के बाद यह विषय संसद तक प्रमुखता से पहुंचा।
उत्तर प्रदेश प्राथमिक शिक्षक संघ के जिला मंत्री चरण सिंह ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्णय से प्रभावित शिक्षकों के मुद्दे को देखते हुए सांसदों ने इसे संसद के दोनों सदनों में प्रभावी ढंग से उठाया। सांसदों की साझा मांग रही कि सरकार इस संबंध में विधेयक लाकर कानून बनाए, ताकि शिक्षकों के हित सुरक्षित रह सकें और वे बिना किसी बाधा के राष्ट्र निर्माण में अपनी भूमिका निभा सकें।
इसी क्रम में टीचर फेडरेशन ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. दिनेश चंद शर्मा के नेतृत्व में संगठन का एक प्रतिनिधिमंडल, फेडरेशन की संरक्षक एवं सांसद जगदंबिका पाल के साथ, 19 दिसंबर 2025 को नई दिल्ली में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से मिला। प्रतिनिधिमंडल ने 1 सितंबर 2025 को आए सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के कारण शिक्षकों में उत्पन्न भय और मानसिक दबाव से अवगत कराते हुए टीईटी की अनिवार्यता पर ज्ञापन सौंपा।
इसके पश्चात शिक्षा मंत्री के आमंत्रण पर प्रतिनिधिमंडल ने संसद भवन स्थित शिक्षा मंत्रालय में पुनः मुलाकात की। इस दौरान सांसद जगदंबिका पाल ने शिक्षकों की सेवा निरंतरता और पदोन्नति में टीईटी से छूट के पक्ष में संवैधानिक तथ्यों के साथ अपनी बात रखी।
डॉ. दिनेश चंद शर्मा ने शिक्षा मंत्री को अवगत कराया कि देशभर में लगभग 25 लाख और उत्तर प्रदेश में करीब 2 लाख शिक्षक इस निर्णय से प्रभावित हुए हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत में 23 अगस्त 2010 से पूर्व तथा उत्तर प्रदेश में 29 जुलाई 2011 से पूर्व नियुक्त शिक्षकों पर टीईटी लागू नहीं होनी चाहिए, क्योंकि उनकी नियुक्ति उस समय सभी संवैधानिक एवं वैधानिक प्रक्रियाओं के तहत हुई थी।
शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने प्रतिनिधिमंडल को आश्वस्त किया कि शिक्षकों के हितों के साथ कोई अन्याय नहीं होने दिया जाएगा और सरकार इस विषय पर संवेदनशीलता से विचार करेगी।
प्रतिनिधिमंडल में टीचर फेडरेशन ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राधे रमण त्रिपाठी, जिला अध्यक्ष मेधरान माटी सहित अन्य पदाधिकारी भी शामिल रहे।



